मुद्दा
पश्चिमी दिल्ली के रघुबीर नगर में गुरु गोबिंद सिंह सरकारी अस्पताल के सामने स्थित 'अहले इस्लाम जामा मस्जिद' नामक मस्जिद उस भूमि पर थी, जिसे दस्तावेज़ों के अनुसार सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अधिग्रहीत किया गया था और अस्पताल सहित नियोजित विकास के लिए चिह्नित किया गया था।
यह केवल स्थल निरीक्षण से नहीं, बल्कि दो वर्षों की दस्तावेज़ी जाँच से स्थापित हुआ।
हमने क्या उजागर किया
सेव इंडिया फ़ाउंडेशन ने तीन प्रमुख सरकारी एजेंसियों से रिकॉर्ड प्राप्त किए:
- दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए)
- दिल्ली नगर निगम (एमसीडी)
- दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी)
रिकॉर्ड से पता चला कि यह भूमि 1961 में अधिग्रहीत की गई थी और बाद में अस्पताल सहित नियोजित विकास के लिए आवंटित की गई। सबसे महत्वपूर्ण, डीयूएसआईबी ने 22 अप्रैल 2024 और 6 जून 2025 के आरटीआई उत्तरों में कहा कि उस स्थल पर मस्जिद के लिए कोई आवंटन नहीं किया गया था।
अदालत से पहले सरकारी कार्रवाई
18 मई 2024 को प्रीत सिरोही द्वारा दिल्ली सरकार की विशेष कार्य बल (एसटीएफ़) को शिकायत के बाद डीयूएसआईबी ने मामला एमसीडी को भेजा। एमसीडी ने सार्वजनिक भूमि पर जिसे उसने “अनधिकृत धार्मिक ढाँचा” बताया, उसके निरीक्षण के लिए पुलिस सहायता माँगी। अगस्त 2024 में अधिकारियों ने स्थल का निरीक्षण किया।
कानूनी हस्तक्षेप
हटाने की कोई प्रभावी कार्रवाई न होने पर सेव इंडिया फ़ाउंडेशन ने दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया। याचिका में अस्पताल के आसपास सार्वजनिक फ़ुटपाथ और आवाजाही पर कथित अतिक्रमण के प्रभाव को उठाया गया।
29 अक्टूबर 2025 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने डीयूएसआईबी को शिकायत पर “शीघ्रता से” कार्रवाई करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि एजेंसी पहले स्वामित्व तय करे और यदि ढाँचा अनधिकृत पाया जाए तो उसे हटाने के लिए उचित कानूनी कार्रवाई करे।
प्रभाव
इस पहल ने एक विवादित भूमि-उपयोग मुद्दे को दस्तावेज़ों पर आधारित, अदालत की निगरानी वाली प्रशासनिक प्रक्रिया में बदल दिया। साथ ही एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ी आधार भी तैयार हुआ: अधिग्रहण रिकॉर्ड, आवंटन दस्तावेज़, आरटीआई उत्तर, सरकारी पत्राचार और निरीक्षण रिकॉर्ड।
सफलता: सार्वजनिक उद्देश्यों और अस्पताल के लिए चिह्नित एक सरकारी भूखंड, वर्षों की प्रशासनिक निष्क्रियता के बाद न्यायिक जाँच के दायरे में आया।